Thursday, January 2, 2020

वो राज नारायण जिन्होंने इंदिरा गांधी को धूल चटाई थी

'जायंट किलर' के नाम से मशहूर और इंदिरा गांधी को चुनावी शिकस्त देने वाले राज नारायण के बारे में कहा जाता है कि अगर वो राजनेता नहीं बने होते तो शायद अपने ज़माने के चैंपियन पहलवान होते.

राजनारायण के इससे कोई ज़्यादा फ़र्क भी नहीं पड़ता था. उनके लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी था लड़ना, -जिसको वो 'संघर्ष' का नाम दिया करते थे.

जाने माने पत्रकार जनार्दन ठाकुर अपनी किताब 'ऑल द जनता मेन' में लिखते हैं, "राजनारायण के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा दिन आया था सितंबर, 1958 में जब उन्होंने अपने समाजवादी साथियों के साथ उत्तर प्रदेश विधानसभा में ऐसा हंगामा मचाया था कि उनको सदन से निकलवाने के लिए पहली बार हेलमेट लगाए पुलिसकर्मियों को सदन के अंदर बुलाना पड़ा था."

"राज नारायण ने अपने साढ़े तीन मन वज़न को ज़मीन पर डाल दिया था और पुलिस वालों को बाक़ायदा उन्हें खींच कर ज़मीन पर घसीटते हुए सदन से बाहर ले जाना पड़ा था. जब वो विधानसभा के मुख्य द्वार तक खींच कर लाए गए, जब तक उनके सारे कपड़े फट चुके थे और उनके जिस्म पर सिर्फ़ एक लंगोट बचा था. वहाँ मौजूद प्रत्यर्शदर्शियों में से एक ने मुझे बताया कि राज नारायण ऐसे लग रहे थे जैसे किसी हैवी वेट पहलवान को अखाड़े में चित कर दिया गया हो."

लेकिन एक ज़माने में उनके बहुत नज़दीकी रहे और इस समय बहुजन समाज पार्टी के प्रवक्ता सुधींद्र भदोरिया उनका एक दूसरा ही रूप खींचते हैं.

भदोरिया बताते हैं, "राजनीति और सामाजिक जीवन में भय नाम का शब्द राज नारायण के शब्दकोष में नहीं था. वो भयविहीन व्यक्ति थे. एक चीज़ उनमें और थी. जिस चीज़ को करने को वो ठान लेते थे, उसके पीछे वो तब तक पड़े रहते थे, जब तक वो पूरी नहीं हो जाती थी."

"एक वाक्य में मैं इसे मैं और सम अप कर दूँ. उनकी जीवन वाक्य था 'कबिरा खड़ा बाज़ार में लिए लकूटी हाथ, जो घर फूके आपना, जो चले हमारे साथ."

अपने चरम रूप में राज नारायण का वज़न करीब 110 किलो हुआ करता था. बाद में वो अपने सिर पर हरे रंग का 'बंदना' या स्कार्फ़ बाँधने लगे थे.

अमरीकी दूतावास द्वारा अमरीकी विदेश मंत्रालय को भेजे एक गुप्त केबिल में कहा गया था कि राज नारायण ने अपने माथे पर त्वचा की बीमारी से बने सफ़ेद दाग़ को छिपाने के लिए स्कार्फ़ बांधना शुरू किया था.

जाने माने समाजशास्त्री और एक ज़माने में राज नारायण के बेहद करीबी रहे प्रोफ़ेसर आनंद कुमार याद करते हैं, "एक तो उनके शरीर का आकार प्रकार अति स्वस्थ हुआ करता था. वो मझोले क़द के थे और गेहुँआ रंग था उनका. बचपन में वो अखाड़े के बहुद शौकीन थे. अगर उनसे किसी का परिचय न कराया जाए तो देखने में वो एक ज़बरदस्त हैवी वेट पहलवान जैसे लगते थे."

"उनका एक बाल सुलभ संवाद का तरीका हुआ करता था. आपसे मिलते ही वो आपका हालचाल पूछेंगे. फिर खाना-पीना कहाँ ठहरे हैं? ऐसा लगता था जैसे वो आपको पता नहीं कब से जानते हैं. उनसे मिल कर ऐसा लगता था जैसे उनके अंदर एक आग जल रही हो, जो आपके अंदर की ठंडक को दूर कर रही हो, एक तपिश दे रही हो और आपको यकीन दिला रही हो."

राज नारायण के राजनीतिक गुरु थे समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया. उनके अनुयायियों की बात मानी जाए तो जो रिश्ता राम और हनुमान का था, वो ही लोहिया और राजनारायण के बीच का था.

लेकिन एक बार राम मनोहर लोहिया भी राज नारायण से नाराज़ हो गए थे.

आनंद कुमार बताते हैं, "कहते हैं कि जब राज नारायण राज्य सभा में आए तो उस समय लोहिया की राय थी कि जो लोग लोकसभा का चुनाव हार गए हों, उन्हें राज्य सभा या विधान परिषद में नहीं आना चाहिए. उसको वो पिछला दरवाज़ा मानते थे. वो ख़ुद 1957 और 1962 का चुनाव हारे थे, लेकिन उन्होंने राज्य सभा के ज़रिए संसद पहुंचने से इनकार कर दिया था."

"राज नाराणजी गुरु के आदेश का पालन करने के लिए गुरु से आगे भी निकल जाते थे. वो जानते थे कि अगर वो संसद से ग़ैरहाज़िर हो जाएंगे तो हालात बिगड़ जाएंगे उत्तर प्रदेश की राजनीति में और वो बाद में साबित भी हुआ. लेकिन डॉक्टर लोहिया कथनी और करनी की एकता को मानने वाले थे, इसलिए वो राज नारायण की इस हरकत से नाराज़ हो गए थे."

"कहते हैं कि राज नारायण रोज़ उनके सात, गुरुद्वारा रकाब गंज के घर के सामने आ कर बैठ जाते थे. अंदर ख़बर जाती थी कि राज नारायण बैठे हुए हैं और लोहिया नाराज़ हो कर कहते थे, 'बैठे रहने दो उसको.' कहते हैं कि एक बार राज नारायण रोते हुए घर के अंदर गए और उससे सारी गाँठ खुल गई और सारे मैल धुल गए. उन्होंने क्षमा भाव से लोहिया से कहा, कि ये मेरा पहला और आखिरी दोष होगा और आगे से मैं कोई ऐसी चीज़ नहीं करूंगा जिससे आपको तकलीफ़ पहुंचे."

1971 के लोकसभा चुनाव में राय बरेली चुनाव क्षेत्र से इंदिरा गाँधी ने उन्हें एक लाख से भी अधिक वोटों से हराया.

लेकिन राज नारायण ने इसे अदालत में चुनौती दी और इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया और उन पर छह सालों के लिए चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया.

मशहूर लेखिका कैथरीन फ़्रैंक ने इंदिरा गांधी की जीवनी 'द लाइफ़ ऑफ़ इंदिरा गांधी' में लिखा, "राज नारायण को भारत के मसख़रों का राजकुमार कहा जाता था. उनकी एक रंगीन शख़्सियत थी. वो अपने सिर पर एक बंदना बाँधते थे और उनका पूरा हाव-भाव एक विदूषक की तरह होता था. जब उन्होंने इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ चुनाव याचिका दायर की तो उसे एक स्टंट माना गया. उसमें बहुत गहराई नहीं थी."

"उन्होंने इंदिरा पर आरोप लगाया था कि उन्होंने यशपाल कपूर को अपना चुनावी एजेंट बनाया जबकि वो अभी भी सरकारी सेवा में थे. उनका इंदिरा पर दूसरा आरोप था कि उन्होंने प्रचार के दौरान चुनावी मंच और लाउड स्पीकर लगाने के लिए सरकार के पीडब्लूडी कर्मचारियों का इस्तेमाल किया."

"1971 के चुनाव में इंदिरा गाँधी ने राज नारायण को एक लाख से भी अधिक वोटों से हराया था. मैं नहीं समझती कि इसमें यशपाल कपूर के चुनाव प्रचार या चुनाव मंच और लाउड स्पीकरों की कोई भूमिका रही होगी. लंदन के टाइम्स ने बिल्कुल सटीक टिप्पणी की थी, 'ये बिल्कुल ऐसा था जैसे प्रधानमंत्री को ट्रैफ़िक नियम का उल्लंघन करने के लिए बर्ख़ास्त कर दिया जाए'."

बहरहाल इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फ़ैसले का नतीजा ये रहा कि इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी और विपक्ष के सभी नेताओं को जिसमें राज नारायण भी शामिल थे, गिरफ़्तार कर लिया गया.

जब 1977 के चुनाव की घोषणा के बाद, 19 महीनों बाद राज नारायण कि रिहाई हुई तो उन्होंने तय किया कि वो इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ फिर चुनाव लड़ेंगे.

उस समय राज नारायण के सहयोगी रहे राज कुमार जैन याद करते हैं, "राज नारायणजी मीसा में हिसार जेल में बंद थे. इत्तेफ़ाक से मैं भी उस समय हिसार जेल में बंद था. मेरा मीसा का रिलीज़ ऑर्डर राज नारायण से पहले आ गया. चलते वक्त उन्होंने मुझे तीन लोगों के लिए पत्र दिए. एक तो थे चंद्रशेखर और दूसरे थे अटल बिहारी वाजपेई. तीसरे का नाम मैं भूल रहा हूँ. इस पत्र में लिखा था कि उन्हें इंदिरा गाँधी के ख़िलाफ़ ज़रूर चुनाव में खड़ा होना है, क्योंकि मैं तो जेल में पड़ा हूँ. मैं चंद्रशेखर के पास गया."

"अटलजी के भी पास गया. वो राज नारायण का संदेश सुन हंस पड़े. उस समय हर कोई एक सुरक्षित सीट की तलाश में था. कोई इस बात को नहीँ सोच सकता था कि कोई इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ भी चुनाव जीत जाएगा. लेकिन राज नारायण ने मन बना रखा था कि अगर उन्हों जेल से छोड़ दिया जाता है तो वो इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ फिर से चुनाव लड़ेंगे."

1977 के चुनाव में आपातकाल की ज़्यादतियों और जबरन नसबंदी के कारण फ़िज़ा इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ बन गई थी, लेकिन कोई ये कल्पना नहीं कर रहा था कि इंदिरा गांधी ख़ुद अपना चुनाव हार जाएंगीं.

राज कुमार जैन बताते हैं, "जामा मस्जिद की जो मीटिंग हुई थी जिसमें इमाम और बाबू जगजीवन राम आए थे. उसमें जिस तरह का हुजूम उमड़ा, जिधर भी देखो लोग ही लोग दिखाई देते थे, उससे लगा कि किला तो अब फ़तह है."

"लेकिन फिर भी राज नारायण वाले चुनाव में लग रहा था कि वो तो इंदिरा गांधी है, उसके पास तो सारी ताक़त है. ये तो लग रहा था कि हमारी लड़ाई बराबर की है लेकिन दावे से ये इलहाम नहीं था कि राज नारायण जीत भी सकते हैं."

बहरहाल राज नारायण चुनाव जीते. मोरारजी देसाई के जनता मंत्रिमंडल में उन्हें स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया. लेकिन एक साल के भीतर ही मोरारजी देसाई ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल से हटा दिया.

सुधींद्र भदोरिया बताते हैं, "कहीं कोई गड़बड़ हो रही हो, उसका विरोध करने के लिए तो राज नारायण बहुत बढ़िया व्यक्ति थे. पर सरकार चलाना उनके बस का नहीं था, सरकार चलाने के कुछ नियम होते हैं, मर्यादाएं होती हैं, क़ायदे क़ानून होते हैं. राज नारायण में क़ायदे क़ानून नाम की कोई चीज़ नहीं थी. अन्याय के ख़िलाफ़ ज़रूर एक बुलंद आवाज़ थी राज नारायण की लेकिन सरकार चलाने में जिस अनुशासन की दरकार होती है वो राज नारायण में थी ही नहीं."

"हालांकि स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर उन्होंने एक बड़ा एतिहासिक फ़ैसला किया था. जिनको उस ज़माने में झोला डॉक्टर या 'बेयर फ़ुट' डॉक्टर कहा जाता था, उनके लिए उन्होंने बहुत काम किया. उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं को आम लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जिसमें वो बहुत हद तक सफल भी रहे."

1977 में मशहूर लेखक वेद मेहता ने राज नारायण का एक इंटरव्यू लिया था जो मशहूर अमरीकी पत्रिका 'न्यूयॉर्कर' के 17 अक्तूबर, 1977 के अंक में छपा भी था.

इसमें मेहता ने राज नारायण से जुड़ा एक मज़ेदार किस्सा लिखा था. हुआ ये कि एक दिन राज नारायण ने अपने मंत्रालय के चोटी के अधिकारियों को बुला कर पूछा कि तुमने किसके आदेश पर अपने भाइयों की नसबंदी करवाई? अफ़सरों ने जवाब दिया, "सर आपको पता है कि किसका आदेश था."

राजनरायण बोले, "मुझे वो काग़ज़ दिखाइए जिस पर वो आदेश लिखा हुआ था." जवाब आया कि उन्हें कोई लिखित आदेश नहीं था. फिर राज नारायण ने हर अधिकारी को एक एक पत्थर दिया. अपने एक क्लर्क को कमरे के बीचोंबीच खड़ा किया और चिल्ला कर बोले, "मैं तुम्हें आदेश देता हूँ कि इस क्लर्क को पत्थर मारो."

कोई अपनी जगह से नहीं हिला. राज नारायण ने कहा, "मैंने आपको इस शख़्स पर पत्थर फेंकने के लिए कहा और आप अपनी जगह से हिले नहीं लेकिन जब उस महिला ने आदेश दिया तो आपको अपने भाइयों की नसबंदी करवाने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई."

मोरारजी देसाई के राज नारायण को हटाने के जो भी कारण रहे हों, लेकिन राज नारायण कैंप का मानना था कि आरएसएस और दोहरी सदस्यता पर उनके रुख़ ने देसाई मंत्रिमंडल से उनकी रुख़सती सुनिश्चित की.

हालांकि बहाना ये बनाया गया कि शिमला में उन्होंने ऐसे स्थान पर जनसभा को संबोधित किया, जहाँ सभा करना वर्जित था.

राज कुमार जैन याद करते हैं हैं, "युवा जनता का हमारा कैंप था शिमला में. उसमें राज नारायणजी को आना था. हमने शिमला के रिज मैदान पर मीटिंग रखी थी. हमारे एक साथी होते थे मार्कंडेय सिंह जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, वो इसके लिए एक आवेदन ले कर डीएम के पास गए. उन्होंने उस आवेदन को अपने दफ़्तर में रखवा दिया. उस समय शांता कुमार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री थे."

"जलसे से कुछ समय पहले जब हम वहाँ तैयारी के लिए गए तो वहाँ के कलक्टर ने आ कर कहा कि रिज मैदान पर जलसा करने की इजाज़त नहीं है. ये प्रतिबंधित क्षेत्र है. हम लोगों ने कहा कि यहाँ तो अटल बिहारी वाजपेई की सभा हुई है. इस पर वो बोले कि उनकी बात अलग है. बहरहाल हम लोगों ने ज़बरदस्ती रिज मैदान पर जहाँ एक छतरी सी बनी होती थी, वहाँ अपना लाउड स्पीकर लगा दिया. बारिश हो रही थी. नीचे हमारे लोग खड़े थे. कुछ सैलानी भी इकट्ठा हो गए थे. उस दिन मंच का संचालन मैं ही कर रहा था."

"मैंने कहा कि आज मंत्री राज नारायण और साथी राज नारायण की परीक्षा है. पीछे बैठे राज नारायण ने हँसते हुए कहा कि अच्छा तो हम मंत्री बन गए. फिर वो अपने बिल्कुल समाजवादी रूप में आ गए. उन्होंने कहा हे शांता कुमार और फिर उन्होंने अपनी तक़रीर शुरू कर दी."

"उस मीटिंग का बहाना बना कर राज नारायण को कैबिनेट से निकाला गया. हालांकि इसके पीछे वजह दूसरी थी. राज नारायण और मधु लिमिये दो ऐसे राजनेता थे जिन्होंने दोहरी सदस्यता का सवाल उठा दिया था. जिस तरह से जनता पार्टी पर जनसंघ गुट काबिज़ हो रहा था, इन्होंने कहा, ये नहीं चलेगा."

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